छत्तीसगढ़ की विकास योजना नरवा, घुरवा बाड़ी के संदर्भ में ग्राम कातरो का सामाजिक आर्थिक सर्वेक्षण

 

डॉ भावना माहुले, डॉ प्रीति बाला चन्द्राकर, निलेष सोनी

भूगोल विभाग, शास. विष्वनाथ यादव तामस्कर स्नातकोत्तर स्वशासी महाविद्यालय, दुर्ग .. 

*Corresponding Author E-mail:

 

ABSTRACT:

छत्तीसगढ़ के 80 जनसंख्या कृषि कार्य करके अपना जीविकोपार्जन करते है। वर्तमान सरकार द्वारा जो विकास योजना लाया गया है। जैसे: (नरवा-नाला) गाँव का पानी जो कि बह जाता है जिसे छोटा बाँध बनाकर एकत्रित करगें तो इससे भूमिगत जल स्त्रोत बढ़ेगा, गाँव के लोगो को जरूरत पढ़ने पर उसका उपयोग किया जा सकता है। (गरवा-पशुधन) जिसमें मनुष्यों के जीवनयापन की उपयोगिता समाहित है। खेत जुताई से लेकर मनुष्यों के भोजन तक पूरी हो जाती है। (घुरवा-कचरा इकट्ठा करने की जगह) खेती के बचा कचरे, घर के कचरे, जिसमें जैविक खाद बनाने की प्रक्रिया होती है। (बाड़ी-खेती) आज के आधुनिक युग में रसायानिक क्रियाओं का अत्याधिक उपयोग हो रहा है, जिससे पर्यावरण के प्रदुषण के कारण मानव के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव हो रहा है, जिसमें बाड़ी में सिंचाई, पषुधन का जैविक खाद की उपयोगिता के आधार पर यह योजनाएँ आने वाले भविष्य के लिए लाभदायक है।

 

KEYWORDS: नरवा, गरवा, घुरवा बाड़ी, सामाजिक आर्थिक विष्लेषण.

 

 


INTRODUCTION:

किसी प्रदेष की आर्थिक विकास के लिए कृषि और उनसे संबंधित कार्यो से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सषक्त बनाने और उनके जीवन स्तर को ऊंचा उठाने, जनसंख्या दबाव में संतुलन स्थापित करने में सहायक है। .. में कृषि से संबंधित अन्य कार्य (नरवा, गरवा, घुरवा, बाड़ी) को परम्परागत पद्धति के साथ उसमें नवीनता को अपनाकर कृषि में जैविक उत्पादकता को बढ़ावा देना है। जिसमें भूमि का संरक्षण करते हुए उत्पादित सामाग्री का मानवीय जीवन को स्वास्थ्य प्रदान करेगा, कृषि यहां के लोगो का जीवकोपार्जन का मूलाधार है। अध्ययन क्षेत्र में कृषि से संबधित अन्य कार्य करके व्यवसायिक कृषि विकास के नियोजन हेतु विष्लेषण कर भविष्य में जैविक कृषि को बढ़ावा दिया जा सके।

 

अध्ययन के उद्देष्य:- प्रस्तावित शोध पत्र के निम्नलिखित उद्देष्य निर्धारित किये गये है -

1. ग्रामीण क्षेत्र में प्राकृतिक संसाधनों के सुनियोजित उपयोग के प्रति आत्म निर्भर बनाना।

2. कृषि क्षेत्र में जनसंख्या के दबाव को कम करना।

3. कृषि से संबंधित अन्य व्यवसाय क्रिया का सुनियोजित ढ़ग से प्रयोग होना।

4. ग्रामीण भूमि आयोग द्वारा रोजगार की संभावनायें प्रदान करना।

5. जैविक कृषि संसाधनों का विकास करना।

विधि तंत्र:- इस अध्ययन में प्रमुख रूप से प्राथमिक एवं द्वितीयक स्त्रोतो से प्राप्त आकड़ो पर आधारित है। आंकड़ो के संकलन हेतु गाँव में पारिवारिक एवं व्यक्तिगत अनुसूची का प्रयोग किया है। इस अध्ययन हेतु दुर्ग जिला के दुर्ग ब्लाक ब्लाक का द्वितीयक आकड़ो का संकलन किया गया है। गांव का अध्ययन प्रतिचयन विधि द्वारा 300 घरो में 500 व्यक्तियों से प्राप्त सूचना पर आधारित है। कृषि से संबंधित विकास नियोजन का रूपरेखा ब्लाक ऑफिस से लिया गया है

 

ग्राम का सामान्य परिचय:-

प्रतिदर्श ग्राम का तरोस्थिति एवं विस्तार:- छत्तीसगढ़ राज्य के नवोदित जिला-दुर्ग स्थित ग्राम कातरो 20°30ˊ उत्तरी अक्षांष से 20°35ˊ उत्तरी अक्षांष तक तथा 81°5ˊ पूर्वी देषांतर से 81°10ˊ पूर्वी देषांतर के मध्य स्थित है, जो धरातल पत्रक क्रमांक 64 एच/2  मे स्पष्ट हैं। इस प्रतिदर्ष ग्राम का कुल क्षेत्रफल 702.77 हेक्टेयर मे विस्तृत है। इसकी समुद्र तल से ऊंचाई 322 मीटर है।

 

1.     बसाव स्थल एवं पर्यावरण अंर्तसंबंध:- प्रतिदर्श ग्रामकातरोएक कृषि प्रधान ग्राम है, यह ग्राम दो दिषाओं से वनाच्छादित पहाड़ियो से घीरा हुआ है जो पर्यावरण एवं वर्षा की दृष्टि से लाभप्रद है। प्रतिदर्ष ग्राम पहाड़ियों के नीचे फैले हुऐ मैदानी भाग मे लोगोंबसाव है।

 

2.     तपमान:- तापमान का प्रत्यक्ष संबंध समुद्र सतह से ऊंचाई और जलमण्डल की दूरी से है। ग्राम कातरोके नजदीक तांदुला नदी होने के कारण तापमान मध्यम पाया जाता है। यहां का वार्षिक तापमान 28° से.ग्रे. से 35° से.ग्रे. तक रहता है और जून माह मे सबसे गर्म हाता है, तब तापमान 38° तक पहुंच जाता है, जबकि दिसंबर माह सबसे ठण्डा होता है ग्रामकातरोका वार्षिक तापान्तर 22° से.ग्रे तक रहता है।

 

3.     वर्षा:- ग्राम कातरोउष्ण कटिबन्धीय मानसूनी प्रदेष के क्षेत्र मे आता है। इस ग्राम चिखली मे मानसूनी जलवायु प्रवाहित होती है, यहां मुख्य रूप से दक्षिण-पष्चिम मानसूनी पवनों द्वारा वर्षा हाती है, जो 15 जून से नवम्बर माह तक रहता है, यहां कुल वर्षा का वार्षिक औसत 120 से 142 सेमी. के मध्य होती है। यहां कुल वर्षा का 85: जून से सितम्बर माह मे होता है। इसे ग्राम मे लौटते हुए मानसूनी पवनो के कारण थोड़ी मात्रा मे वर्षा होती है।

 

4.     वनस्पत्ति:- वनस्पत्ति समस्त जीव जगत का आधार होता है, जिसका उपयोग जीव-जन्तु अपने भोजन एवं आवास के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से करते है। ग्राम कातरोमंे उष्णकटिबंधीय वन पायी जाती है जो ग्रीष्म काल या शुष्क काल में अपनी पत्तियां गिरा देती है इसी कारण इसे पतझड़ वन भी कहा जाता है। यहां पायी जाने वाली वनस्पत्तियों में पीपल, नीम, बरगद, आम, जामुल, बबूल, करण एवं नीबूआदि पायी जाती है। यहाँ वनांे में साल, सागौन, बीजा, तेंदू आदि विभिन्न प्रजाति के वृक्ष पाये जाते हैं।

 

5.     मिट्टी:- इस ग्राम को मृदा के संगठन की दृष्टि से कन्हार मटासी वर्ग के अंतर्गत रखा गया है। इस गांव मे चार प्रकार की मिट्टियाँ पायी जाती है -

1.     मटासी मिट्टी

2.     कन्हार मिट्टी

3.     रेतीली मिट्टी

4.     भूरी मिट्टी

इस गांव मे मटासी मिट्टी एवं कन्हार मिट्टी में अधिक मात्रा मे कृषि किया जाता है, तथा मटासी एवं भूरी मिट्टी के ऊपर गांव का आवासीय क्षेत्र है।

 

6.     अधिवास:- मानव जाति की तीन मूलभूत आवष्यकताओं मे से अधिवास भी एक प्रमुख क्षेेत्र है, ग्राम कातरो मे अधिकांष मकान पर्क्के इंट से बने है तथा यहां मिश्रित एवं कच्चे मकान भी पाये जाते हैं अधिवासों मे मकान के पीछे एक बाड़ी और सामने एक बरामदा पाया जाता है, और मकानों के द्वार गलियों की ओर ही खुलते हैं। यहां मकान पास-पास बसा हुआ है।

 

7.     यातायात:- ग्राम कातरोप्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत पक्की सड़क के द्वारा मचान्दुर, कातरो मुख्य मार्ग से जुड़ा हुआ है जो ग्राम से 05 कि.मी पष्चिम दिषा मे स्थित है। गांव के लोगों को अन्यत्र कहीं जाने के लिए रिसामासे रेल परिवहन की सुविधा का उपयोग करते हैं। यह रेल मार्ग भिलाई इस्पात संयंत्र से संलग्न दल्लीराजहरा लौह अयस्क के कारण जोड़ा गया है, जो क्षेत्र के लोगो की शहरी परिवेष के साथ जोड़ता है।

 

प्रतिदर्ष ग्रामकातरो की जनांकिकीय संरचना:-

जनसंख्या:-

किसी निष्चित अवधि में किसी निष्चित क्षेत्र में निवास करने वाले जन समुदाय को वहां की जनसंख्या कहते हैं। वास्तव में जनसंख्या का तात्पर्य जनसंख्या की विषेषताओं से है, अर्थात् उस क्षेत्र की जनसंख्या, आयु संरचना, लिंगानुपात, जाति संरचना, जनसंख्या वृद्धि दर आदि की स्थिति कैसी है।

 

किसी गांव के आर्थिक सामाजिक विकास में उस गांव के निवासियों का विषेष योगदान होता है, क्योंकि गांव के प्राकृतिक संसांधनों को उपयोग तथा गांव की औद्योगिक एवं व्यापारिक उन्नति वहां निवास करने वाली जनसंख्या के वितरण घनत्व एवं उसकी अन्य जनांकिकी विषेषताओं से जुड़ा हुआ है। इसलिए गांव का अध्ययन करते समय वहां के जनसंख्या का अध्ययन आवष्यक होता है।

 

प्रतिदर्ष ग्राम कातरोमें जातिवार पुरूष महिला जनसंख्या प्रतिरूप (2011-2017)

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2011

2017

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14.30%

स्त्रोत -पंचायत कार्यालय कातरो

 

उपरोक्त क्षेत्रीय अध्ययन में प्रतिदर्ष ग्राम कातरो की कुल जनसंख्या 2011 के जनगणना के अनुसार 2065 थी, किन्तु वर्तमान मिषन अन्त्योदय बेसलाईन सर्वे 2017 के अनुसार गांव की कुल जनसंख्या 2098 है। जहां 2011 में गांव की कुल जनसंख्या में पुरूषों महिलाओं की संख्या क्रमषः 1008 1057 थी वहीं 2017 में बढ़कर क्रमषः 1018 1080 हो गई है।

 

प्रतिदर्श ग्राम कातरोमें जातिवार पुरूष महिला जनसंख्या प्रतिरूप (2011-2017)

 

आर्थिक सर्वेक्षण: भूमि एवं ग्राम सुराजी योजना के संदर्भ में:-

कृषि:- कृषि एक अत्यंत व्यापक आर्थिक कार्य है जो विस्तृत भू-क्षेत्र पर संपन्न होता है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था मे कृषि का सर्वाधिक योगदान होता है। कृषि शब्द की उत्पत्ति अंग्रजी समानार्थी शब्द श्।हतपबनसजनतमश् से हुआ है। यह शब्द लैटिन भाषा के एगर ;।हमत.पिमसक वत ेवपसद्ध तथा कल्चर ;ब्नसजमतए जीम बंतम िजीम जपससपदह वद्धि से बना है इसका अर्थ भूमि को जोतकर फसल पैदा करना है। कृषि का यह संकीर्ण अर्थ हो जाता है विस्तृत अर्थो मे इसके अंतर्गत कुदाल पर आधारित जीवन निर्वाह वाले खेती से लेकर मषाीनो द्वारा वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग करके व्यापारिक उद्देष्य से की जाने वाले कृषि तक आती है।

 

भूमि एवं कृषि भूमि उपयोग:- भूमि एवं कृषि भूमि उपयोग आर्थिक विकास का द्योतक है, जो भौगोलिक अध्ययन का विषिष्ट पहलू है और इस पर प्राकृतिक, आर्थिक, एवं सामाजिक तत्वांे का प्रभाव सर्वाधिक होता है। भूमि एक महत्वपूर्ण संसाधन है जो प्रकृति द्वारा प्रदत्त निःषुल्क उपहार है तथा मानव जाति के क्रियाकलापों का मुख्य आधार है। भूमि उपयोग दो बातों पर निर्भर करता है:-

1.  मनुष्य द्वारा निधरित बाह्य सीमा।

2.  मानव क्षमता एवे संस्कृति द्वारा अतिरिक्त सीमा। यह भूमि की वास्तविक तथा संभावित उपायो को निर्धारित करती है।

 

भूमि उपयोग तथा कृषि भूमि उपयोग परस्पर एक दूसरे से संबंधित है। किंतु उसमे उल्लेखनीय अन्तर पाया जाता है।

 

   भूमि उपयोग:- किसी प्रदेष मे संपूर्ण भूमि का विभिन्न कार्यो के लिए किया जाने वाले उपयोग भूमि उपयोग कहलाता है। इन विभिन्न कार्य के अंतर्गत भूमि उपयोग वन क्षेत्र, कृषि लिए अनुपलब्ध क्षेत्र, पड़ती को छोड़कर अन्य अकृषिक्षेत्र, पड़ती भूमि, शुद्ध शस्य क्षेत्र आदि रूप मे होता है।

 

   कृषि भूमि उपयोग:- कृषि भूमि उपयोग का अर्थ है, कृषि भूमि का विभिन्न कृषि कार्यो मे किया जाने वाला उपयोग। कृषि भूमि के अंतर्गत केवल कृषि के योग्य या कृषि हेतु प्रयुक्त भूमियों पर ही विचार किया जाता है। इसके अंतर्गत भूमि उपयोग कुल कृषित क्षेत्र, शुद्ध शस्य क्षेत्र, सिंचित क्षेत्र, असिंचित क्षेत्र, द्विफसलीय क्षेत्र आदि रूप मे होता है।

 

प्रतिदर्ष ग्राम कातरो मे भूमि उपयोग प्रतिरूप (2020)

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47

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प्रतिदर्ष ग्राम कातरो में भूमि उपयोग प्रतिरूप (2020)

 

प्रतिदर्श ग्रामकातरोमें कृषि-भूमि उपयोग प्रतिरूप:- जब किसी क्षेत्र की कृषिगत दषा का अध्ययन किया जाता है तो उस क्षेत्र की भूमि उपयोग का अध्ययन महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि इसके अंतर्गत हम कृषि भूमि संबंधित विभिन्न पक्षों सिंचिंत क्षेत्र, असिंचित क्षे़त्र, बहुफसली क्षेत्र, शुद्ध बोया गया क्षेत्र, खरीफ फसल क्षेत्र, रबी फसल क्षेत्र, जायद फसल क्षेत्र आदि का अध्ययन करते हैं, जिससे उस क्षेत्र की कृषिगत दषाओं का स्पष्ट ज्ञात होता है।

कृषि भूमि उपयोग अध्ययन से संबंधित प्रथम महत्वपूर्ण प्रयास जर्मन विद्वान वॉन थ्यूनेन ने 1826 मे किया था। अन्य विद्वानोंने महत्वपूर्ण प्रयास किये।

 

प्रतिदर्ष ग्राम कातरो के कृषि भमि उपयोग का अध्ययन निम्न बिन्दुओं के आधार पर किया जा सकता है

 

·       कुल कृषि क्षेत्रः- कुल कृषि क्षेत्र से तात्पर्य उस भूमि से है जिस पर कृषि की जाती है प्रतिदर्ष ग्राम कातरो मंे कुल कृषि क्षेत्र 402 हेक्टेयर है जो पृष्ठ के कुल क्षेत्रफल का 57.20: है।

·       शुध्द शस्य क्षेत्र:-किसी क्षेत्र मे एक वर्ष मे बोया गया कुल कृषि क्षेत्र, शस्य क्षेत्र कहलाता है। प्रतिदर्ष ग्राम कातरो का शुध्द शस्य क्षेत्र 402 हेक्टेयर है जो कुल कृषि का 100: है।

·       सिंचित/असिंचित क्षेत्र:- कृत्रिम विधियां जैसे नहर, नलकूप, तालाब, आदि द्वारा पौधों फसलो को जल उपलब्ध कराना सिंचाई कहलाता है। प्रतिदर्ष ग्राम कातरोके कुल पृष्ठभूमि क्षेत्र का 13.37: है, तथा कुल कृषित क्षेत्र का 23.37: है जो 94 हेक्टेयर मे फैला हुआ है तथा कुल पृष्ठभूमि का 43.82: एवं कुल कृषित भूमि का 76.61: असिंचित है जो 308 हेक्टेयर मे फैला हुआ है। गांव का सिंचित भाग को जल उसरीटोला जलाशय जो तांदुला नदी के सहायक नदी से जुडा़ हुआ है से निकले नहर द्वारा, नलकूपों तालाबों के द्वारा प्राप्त होती है।

·       द्विफसलीय क्षेत्र:- प्रतिदर्ष ग्राम मे द्विफसलीय क्षेत्र 50.06 हेक्टेयर मे फैला है,जो कुल पृष्ठभूमि का  7.11 है।

·       फसल का कुल क्षेत्रः- फसल का कुल क्षेत्र एक वर्ष विषेष मे एक बार और एक से अधिक बार बोया जाने वाला क्षेत्रफल होता है। इस प्रकार प्रतिदर्ष ग्राम कातरो में फसल का कुल क्षेत्र 452 हेक्टेयर है।

शस्य गहनता:- शस्य गहनता से आषय किसी निष्चित कृषि क्षेत्र मे एक वर्ष मे बोये जाने वाली फसलों की आवृत्ति या संख्या से है। शस्यगहनता का निर्धारण सकल बोया गया क्षेत्र और शुद्ध शस्य क्षत्र के अनुमान के द्वारा किया जाता है। इस प्रकार प्रतिदर्ष ग्राम कातरो का शस्यगहनता सुचकांक इस प्रकार होगा।

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                                                 452 × 100

                                       = ––––––––––––––  =   112-43

                                                      402                   

 

प्रतिदर्श ग्राम कातरो मंे कृषि-भूमि उपयोग प्रतिरूप (2020)

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प्रतिदर्श ग्राम कातरो में कृषि-भूमि उपयोग प्रतिरूप (2020)

 

प्रतिदर्श ग्राम कातरो में वर्ष 2020-21 मे शस्यक्रम: -

      खरीफ फसल:- भारत मे जून-जुलाई मे बाई जाने वाली फसलों को खरीफ फसल कहते हैं, जिन्हे अक्टूबर के आस-पास काटा जाता है। प्रतिदर्ष ग्राम कातरो के शस्य क्रम मे खरीफ का स्थान प्रथम है क्योंकि रबी फसल के लिए सिंचाई की सुविधा आवश्यकता के अनुरूप नहीं है।

 

      खरीफ फसल के अंतर्गत उत्पादित खाद्यान्न:- प्रतिदर्श ग्राम कातरो में खरीफ की फसल में प्रमुख रूप से चावल की खेती की जाती है। कुल कृषित क्षेत्र के लगभग उत्पादन 368 हेक्टेयर भूमि पर चावल का फसल लिया जाता है। दूसरा प्रमुख फसल उड़द है, जिसका उत्पादन 13 हेक्टेयर भूमि पर किया जाता है। तीसरी फसल अरहर है जिसका उत्पादन 9 हेक्टेयर भूमि पर किया जाता है। चौथा फसल मक्का है जिसका उत्पादन 4 हेक्टेयर पर किया जाता है। इस प्रकार खरीफ फसल के अंतर्गत 402 हेक्टेयर भूमि पर कृषि कार्य किया जाता है।

 

      रबी फसल:- अक्टूबर-नवम्बर माह मे बायी जाने वाली फसलों को रबी फसल कहते हैं।, जिसे मार्च-अप्रैल के आस-पास काटा जाता है। प्रतिदर्ष ग्राम कातरो के शस्यक्रम में रबी फसल का दूसरा स्थान है।

 

      रबी फसल के अंतर्गत उत्पादित खाद्यान्न:- रबी फसल के अंतर्गत प्रतिदर्ष ग्राम कातरो में प्रमुख रूप से तिवड़ा एवं अलसी का फसल फसल लिया जाता है। कुल कृषित क्षेत्र के लगभग उत्पादन 30 हेक्टेयर भूमि पर तिवड़ा की फसल लिया जाता है। दूसरा प्रमुख फसल अलसी है, जिसका उत्पादन 12 हेक्टेयर भूमि पर किया जाता है। तीसरी फसल गेंहू है, जिसका उत्पादन 0.50 हेक्टेयर भूमि पर किया जाता है। चौथा फसल चना है, जिसका उत्पादन 0.50 हेक्टेयर भूमि पर किया जाता है।

 

      जायद फसल:- जायद फसल को सम्पूर्ण वर्ष कृत्रिम सिंचाई के माध्यम से उगाया जाता है। ये दो प्रकार के होते हैं। जायद रबी जायद खरीफ फसल। इन फसलो के अंतर्गत कपास, खरबूज, तरबूज, सब्जियां आदि मुद्रादायिनी फसलें आती है। प्रतिदर्ष ग्राम कातरो में किसी भी प्रकार की जायद फसलें नही उगाई जाती है।

 

प्रतिदर्ष ग्राम कातरो मे खाद्यान्न-उत्पादन

प्रतिदर्ष ग्राम कातरो में खरीफ फसलो का कुल क्षेत्र मे कुल उत्पादन (2020)

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4

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3.58

0.99

स्त्रोत - पटवारी कार्यालय कातरो

 

प््रातिदर्ष ग्राम कातरो में खरीफ फसलों मे भूमि उपयोग प्रतिरूप (2020)

 

प््रातिदर्ष ग्राम कातरो में रबी फसलों का कुल क्षेत्र में कुल उत्पादन(2020)

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0.50

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4.18

1.16

स्त्रोत पटवारी कार्यालय

 

प्रतिदर्ष ग्राम कातरो में रबी फसलों में भूमि उपयोग प्रतिरूप (2019)

 

प्रतिदर्श ग्राम कातरो मे अन्य कृषिगत विषेषताएँः-

 

प्रतिदर्ष ग्राम मे खाद्यान्न उपभोग एवं अतिरेक उत्पादन की स्थिति:-

किसी क्षेत्र विषेष के खाद्यान्न उत्पादन उपभोग एवं अतिरेक उत्पादन के अध्ययन उस क्षेत्र विषिष्ट किसानों की आर्थिक स्थिति, प्रति इकाई उत्पादन क्षमता, कृषि के उद्देष्य आदि की स्पष्ट जानकारी हो पाती है। चूंकि प्रतिदर्ष ग्राम कातरो मंे जीवन निर्वाह कृषि की जाती है। अतः अतिरिक्त उत्पादन की स्थिति निम्न है।

 

किसी क्षेत्र विषेेष के खाद्यान्न उत्पादन, उपभोग एवं अतिरेक उत्पादन के अध्ययन उस अतिरिक्त उत्पादन की निम्न स्थिति का प्रमुखकारण किसानों के पास कृषि की सीमित मात्रा कृषि पर निर्भरता कृषि भूमि की निम्न उत्पादन क्षमता आदि पक्ष है। प्रतिदर्ष ग्राम कातरो के अधिकांष किसानों के पास 1 से 3 एकड़ की कृषि भूमि योग्य उपलब्ध है, जिससे बड़ी मुष्किल से परिवार के भरण-पोषण के लायक उपज प्राप्त होता है किसान कृषि कार्य के अलावा मजदूरी कर अपने परिवार का भरण-पोषण करते हैं।

 

प्रतिदर्ष ग्रामकातरो मे विपणन सुविधा:-

सामान्यतः कृषि विपणन से तात्पर्य उन सभी कार्यो से होता है जिनके द्वारा खाद्य वस्तुएं एवं कच्चा माल फार्म से उपभोक्ता तक पहुंचता है।

 

किसी भी देष या क्षेत्र के कृषि क्षेत्र के विकास मे सुविधा का महत्वपूर्ण योगदान होता है, क्योकि इसके माध्यम से ही किसानों को अपने खाद्यान्न उचित मूल्य मे बेचने की सुविधा मिलती है तथा उपभोक्ता तक उचित मूल्य समय पर पहुंचती है। प्रतिदर्ष ग्राम कातरो के किसानों के केवल धान के उपज के लिए ही समर्थन मूल्य बेचने की सुविधा उपलब्ध है जो गांव से 4 कि.मी की दूरी पर ग्राम मचान्दुर में है मचान्दुरतक पहुंचने के लिए पक्की सड़क मार्ग की सुविधा उपलब्ध है, लेकिन अन्य फसलों अरहर, मक्का, उड़द, तिल, चना, गेंहू, तिवड़ा, अलसी आदि के लिए बिचौलियों पर निर्भरता है, जिनके कारण किसानो को इन फसलों का उचित मूल्य भी नहीं मिल पाता है।

 

कृषि मंे निवेष:- किसी क्षेत्र विषिष्ट की कृषि संबंधी विभिन्न पक्षों के अध्ययन मे एक महत्वपूर्ण पक्ष होता है, कृषि मे निवेष का अध्ययन। इस पक्ष से केवल उस क्षेत्र के विभिन्न फसलों के भिन्न-भिन्न मदों में किये गये निवेष की जानकारी मिलती है बल्कि उस क्षेत्र के किसानोंकी स्थिति कृषि कार्य के प्रति उनकी दक्षता का भी ज्ञान होता हैं। प्रतिदर्ष ग्राम कातरो मे वर्तमान समय मे भी पारम्परिक कृषि की जाती है। इसका एक कारण शैक्षिक स्थिति तो है, तथापि किसानों की आर्थिक दषा भी एक महत्वपूर्ण पक्ष है, जिसका स्पष्ट प्रभाव कृषि संबंधी निवेष पर दिखता है। बीज, उर्वरक, जोताई, रख-रखाव, कीटनाषक, कटाई-मिंजाई आदि विभिन्न मदांे पर निवेष किया जाता है।

 

      बीज:- बीज के किस्म का चुनाव भूमि के बनावट जल की उपलब्धता इसके साथ ही फसल की सुरक्षा केा ध्यान मे रखकर किया जाता है। फसल की उत्पादकला बीज की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। प्रतिदर्ष ग्राम मे सम्पूर्ण कृषिगत निवेष का 24: से 25: इस क्षेत्र किया जाता है। गांव के आधे से अधिक किसान वर्तमान समय मे भी पुराने बीज का प्रयोग करते हैं। धान, अरहर गेंहू फसलों के लिए किसान उपचारित बीजों का प्रयोग कर सिंचाई की साधनों की अपर्याप्तता,वर्षा की अनिष्चितता के कारण अधिकांषतः 90 से 95 दिनों के वर्धनकाल वाले बीजों का प्रयोग किया जाता है।

 

      जुताई:- भूमि के उपरी परत को चिरकर, पलटकर, या जोतकर उसे बोवाई या पौधारोपण के योग्य बनाना जुताई कहलाता है। प्रतिदर्ष ग्राम में कुल निवेष का 20: जोताई में किया जाता है। गांव मे कुछ गिने-चुने किसान के पास टैªक्टर है। इसलिए अधिकांष किसान टैªक्टरों से किराया देकर जुताई कराता है। तथापि कुछ किसान आज भी पारम्परिक तरीकांे से बैलोंके द्वारा जुताई की जाती है।

 

      उर्वरक:- उर्वरक कृषि मे प्रयुक्त रसायन है, जो कि पेड़-पौधो की विधि मे सहायता के लिए इस्तेमाल किये जाते हैं। प्रतिदर्ष ग्राम कृषक अपने फसलों की वद्धि एवं भूमि की उर्वरक शक्ति बढ़ाने के लिए अधिकांषतः गोबर खाद एवं रासायनिक खाद का उपयोग करते हैं। रासायनिक खाद के अंतर्गत यूरिया, डी..पी., पोटाष का प्रयोग करते हैं, किन्तु इन रासायनिक खाद का उपयोग अनियमित्ता एवं असंतुलित है।

 

      रखरखाव, कीटनाषक, खरपतवार नाषक, टॉनिक:- फसल की बोवाई के पश्चात बेहतर उत्पादन के लिए आवष्यक है कि इसका रख-रखाव एवं देखभाल सुनिष्चित हो रख-रखाव के अंतर्गत फसल के निंदाई-गुड़ाई से लेकर विभिन्न कीटांे बीमारियों से सुरक्षा के लिए कीटनाषक टॉनिक का प्रयोग सम्मिलित करते हैं। प्रतिदर्ष ग्राम कातरो मंे किसान अपनी खेती की निंदाई-गुड़ाई स्वयं करते है। कीटांे, बीमारियांे, खरपरवारांे से सुरक्षा के लिए विभिन्न कीटनाषक, खरपतवार नाषक, क्लोरोफ्लोरो सल्फर, बोफरो बेंजीन, आदि का प्रयोग निकटवर्ती ग्राम मचान्दुर के कृषि केन्द्रों से खरीदकर करते हैं।

 

      कटाई-मिंजाई:- फसल उत्पादन के अगले क्रम में है कटाई मिंजाई कार्य प्रतिदर्ष ग्राम कातरो में किसान फसल कटाई अधिकांषतः पारम्परिक तरीके से ‘‘हसिया‘‘ के द्वारा स्वयं करते हैं। मिंजाई के लिए अधिकांष किसान टैªक्टर एवं थ्रेषर का प्रयोग करते हैं तथापि कुछ किसान आज भी बैलागाड़ी का प्रयोग करते है। कटाई मिंजाई कार्य मे प्रति एकड़ 2500 से 3000 निवेष होता है।

 

      समस्या:- प्रतिदर्ष ग्राम कातरो मे कृषि उपज मे कमी का कारण यह है कि यहां कृषि कार्य मे बीजों का सही चुनाव नहीं करते है वे आज भी परम्परागत तरीकों से पुराने बीजों का प्रयोग करते है तथा कृषि पद्धति में भी उन्हीं पुराने तरीकों का प्रयोग किया जाता है और जोत के आकार मे भी संकुचन दृष्यगत होता है तथापि कृषकों की शैक्षणिक स्तर भी एक कारण है।

 

      सुझाव:- प्रतिदर्ष ग्राम कातरो मे कृषि मे उपज मे कमी से उबरने के लिए यह सुझाव है कि कृषि क्रम मे बीजों का सही चुनाव करें और उन्नत किस्म के बीजों का ही प्रयोग करे। कृषि करने की पद्धति में भी सुधार की आवष्यकता है। कृषक आधुनिक पद्धति से कृषि करे और खेतों के जोत के आकार मे वृद्धि करे तथापि कृषको को कृषि संस्थानो द्वारा प्रषिक्षण की सुविधा प्रदान करे

 

प्रतिदर्श ग्र्राम कातरो: ग्राम सुराज अभियान (नरवा, गरवा, घुरवा और बाड़ी):- वर्तमान मे प्रदेष मे आधे से अधिक ग्राम पंचायतो मे गोठान के कार्य स्वीकृत किए जा चुके हैं और गौठान पूर्ण हो चुके हैं। छत्तीसगढ़ शासन की सुराजी ग्राम योजना के तहत राज्य मे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति देने के उद्देेष्य से गांव-गांव में नरवा, गरूवा, घुरवा और बाड़ी के विकास के काम प्राथमिकता से किये जाए।

 

      नरवा:- इसके तहत आवष्यकतानुसार नालों तथा नालों मे तथा नहरों मे चेक डेम का आविष्कार किया जा रहा है, ताकि इसके माध्यम से वर्षा का संग्रहित हो सके, और वाटर रिचार्ज से गिरते भूजल स्तर पर रोक लग सके। इससे खेती में आसानी होगी।

 

 

 

      गरवा:- इसके अन्तर्गत गांवो मे जो भी पशुधन है उन्हे एक ऐसा डे केयर सेंटर उपलब्ध करवाना है, जिसमे वे आसानी से रह सके और उन्हें चारा पानी उपलब्ध हो। इसके लिए गोठान निर्माण से लेकर आवश्यक संसाधन, जमीन आदि प्रदान किया जाता है

 

 

      घुरवा:- यह एक प्रकार का जमीन मे खोदा हुआ गड्डा होता है, जिसमे मवेषियों के मलमूत्र एवं गोबर को एकत्रित किया जाता है, जिससे कि इसके प्रयोग से गोबर गैस और जैविक खाद बनाई जा सके।

 

 

      बाड़ी:- यह घर से लगा हुआ बगीचा होता है, जिसमें प्रमुख रूप से खाद्य पदार्थो सब्जी फल-फूल उगाये जाते हैं, जिससे की दैनिक आवश्यकताओ की पूर्ति की जा सके तथा साथ ही लोगो की आर्थिक सहायता भी हो सके

 

 

ग्राम पंचायत कार्यालय कातरो की व्यावसायिक स्थिति

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स्त्रोत-पंचायत कार्यालय कातरो

प्रतिदर्श ग्राम कातरो: प्रवास की स्थिति वर्ष 2020:- मनुष्य एक गतिषील प्राणी है, जो एक स्थान से दूसरे स्थान मे जाने को सक्षम होता है। जनसंख्या प्रवास एक स्थान से दूसरे स्थान के लिए मानव गतिषीलता का परिणाम है। मानव जिस स्थान को छोड़ता है वहां से ज्ञान तकनीक संस्कृति आदि को अपने साथ ले जाता है और नवीन स्थानों पर उनका प्रसार करता है तथा उन्हें सुरक्षित रखने का प्रयत्न करता है।

 

संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार- ‘‘प्रवास सामान्यतः निवास स्थान को बदलते हुए एक भौगोलिक इकाई के लिए भौगोलिक गतिषीलता का एक रूप है।‘‘

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प्रतिदर्श ग्राम कातरो: अधोसंरचना की उपलब्धता वर्ष 2020

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स्त्रोत - क्षेत्रीय सर्वेक्षणकातरो

 

प्रतिदर्ष ग्रामकातरो में वनस्पत्ति एवं जीव-जन्तु:-

पृथ्वी ग्रह पर विद्यमान विभिन्न प्रकार के जीवों, वनस्पत्तियों एवं प्राणियों के प्रजाति मे पाई जाने वाली विविधता को जैव विविधता की संज्ञा दी जाती है इसके अंतर्गत उन पारिस्थितिकीय प्रणालियों को सम्मिलित किया जाता है, जिसका निर्माण इन समुदायो के द्वारा किया जाता है

 

इनमें गतिषील रूपान्तरित क्रिया सम्मिलित है, जिनमें प्रजातियो मे जनसंख्या विकास तथा विनाष होता हैे जीव जगत की पारम्परिक प्रक्रियाओं पर बल दिया जाता है, जिससे इसका अस्तित्व विद्यमान है। ऐतिहासिक कालों मे अनेक जीव जन्तु एवं वनस्पत्ति प्रजातियाँ उत्पन्न हो रही है तथा अनेक प्रजातियाँ विलुप्त हो रही है। कुछ प्रजातियो का वातावरण अनुकूल हुआ तथा कुछ नवीन प्रजातियों का उद्भव हुआ। अतीत के भूगर्भिक काल मे अनेक बार ऐसी घटनाएँ घटित हुई है।

 

भौतिक अध्ययन के लिए चयनित धरातल पत्रक का क्षेत्र भी मानसून जलवायु वाला क्षेत्र है, जो भौगोलिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। जहां जलवायु वनस्पत्ति एवं भू-आकृतिक अंर्तसम्बन्ध विद्यमान है। भू-आकृतिक बनावट के अनुषरण जलवायु एवं प्राकृतिक वनस्पत्तियां करती है। इसके अंर्तसम्बंधो से जीव-जन्तु प्राणी निवास करते हैं। यह क्षेत्र उष्ण कटिबंधीय पर्णपाती वन के अंतर्गत आता है। ऊपरी आवरण मंे वृक्षांे की पत्तियां शुष्क आवरण मे नियमित रूप से गिर जाती है इसकी ऊंचाई 40 मीटर के मध्य स्थल मे बौने वृक्ष पाई जाती है एवं नीचे स्तर मे सदाबहार वन पायी जाती है।

 

इन वनों मे मुख्य रूप से आम, बांस, साल, सागौन, महुआ, तेंदू, करण, पीपल, बरगद, सहतुत, पलास, एवं आंवला आदि वृक्ष प्रमुख रूप से पाये जाते हैं। किसी भी ़क्षेत्र मे प्राणी जीवन उसकी तीव्रता उस क्षेत्र की संरचना, सकल बायोमास की संघटना पर निर्भर करती है, क्योकि वनस्पत्ति की उक्त विषेषतायें बनी रहती है। अध्ययन क्षे़त्र चूंकि मानसूनी जलवायु वाला है। अतः यहां पर वनस्पत्तियो में वृद्धि आमतौर पर होती रहती है।

 

अध्ययन क्षत्र मे सबसे उपरी भागा से धरातल तक प्राणी समुदायों में पाया जाता है। उपरी समुदायो मे कीटभक्षी एवं चमगादड़ो का प्रभुत्व बना रहता है। यहां गिलहरी एवं गौरेया अधिक पाया जाता है मध्यम स्तर मे भी उड़ने वाले पक्षी एवं कीट भक्षी चमगादड़ बहुतायत पाया जाता है।

 

स्तनधारी जन्तुओं में लघु आकार से लेकर वृहद आकार की प्राणियंा पायी जाती है। चीता, लोमड़ी, लकड़बघ्घा, भालू, सियार तथा रेंगने वाले जीवों मे छिपकली, गिरगिट, साँप, मुर्गी एवं बतख प्रमुख है। जलचर प्राणियों में मछलियाँ, कछुआ, मेंढक, एवं केकड़ा आदि प्रमुख रूप से पाये जाते हैं।

 

प्रतिदर्श ग्राम कातरो मे निम्नलिखित प्रकार के वृक्ष एवं जीव जन्तु पाया जाता है, जो की इस प्रकार से है वृक्षो मे बबूल, आम, नीम, शीषम, कौहा, इमली, बांस, सागौन, एव ंसाल आदि वृक्ष अधिक पाया जाता है तथा जीव-जन्तु मे गाय, बैल, भैंस, बकरी, कुत्ता, मुर्गी, मछलियाँ आदि पाये जाते हैं।

 

सुझाव

कृषि भूमि मे जोत के आकार में वृद्धि:-प्रतिदर्ष ग्राम कातरो में कृषि भूमि में जोत के आकार मे कमी है। इसका विकास या वृद्धि किये जाने से भूमि का आकार बढ़ेगा, जिससे जोत का आकार में वृद्धि होगी तथा उपज भी अधिक होगा।

अन्य कृषि फसलो का उत्पादन:- प्रतिदर्ष ग्राम कातरो में सीमित फसलों का ही कृषि किया जाता है, जिनसे कृषकांे को अधिक लाभ प्राप्त नहीं होता है। उन्हें मुद्रादायनी फसलों का उत्पादन किया जाना चाहिये।उन्हें धान, गेंहू, दलहन के अलावा गन्ने, सोयाबीन, सरसांे आदि की कृषि किया जाना चाहिये।

प्रषिक्षण की सुविधा:- चूंकि कृषि करने की पद्धति में सुधार होगा तो लोगों को और अधिक लाभ होगा। इसके अंतर्गत कृषकांे को उन्नत कृषि करने के लिए उन्हें प्रषिक्षण की सुविधा प्रदान करें, जिससे प्रषिक्षित होकर वे और अधिक लाभ प्राप्त कर सके।

सरकार द्वारा प्रोत्साहन:- सरकार को भी कृषकों के द्वारा उत्पादित फसलों के समर्थन मूल्यों में वृद्धि करने से कृषकों का आत्मविष्वास और अधिक मजबूत होगा अतः शासन द्वारा इस संदर्भ मंे विचार करना चाहिए।

सिंचाई के विस्तृत विकास योजना (ग्राम पंचायत कातरो):- कृषि विकास पर्यावरणीय, राजनीतिक, संस्थात्मक एवं आधार संरचनात्मक कारकों द्वारा प्रभावित होता है। आधार संरचनात्मक कारकों के अंतर्गत सिंचाई, विद्युत आपूर्ति, रासायनिक या जैविक उर्वरक, उन्नत बीज इत्यादि को शामिल किया जाता है। ये कारक समष्टि एवं व्यष्टि, दोनों स्तरों पर एक विशिष्ट भूमिका का निर्वाह करते हैं।

 

सिंचाई कृत्रिम साधनों द्वारा खेतों को जल उपलब्ध कराना सिंचाई कहलाता है। कृत्रिम साधन जैसे-नहर, कुएं, तालाब, बोरवेल इत्यादि।

 

सिंचाई की भूमिका:- सिंचाई द्वारा न्यून वर्षा वाले क्षेत्रों में शुद्ध बुआई क्षेत्र की वृद्धि करने तथा बहुविध फसलों को प्रोत्साहन देने के परिणामतः सकल फसल क्षेत्र में वृद्धि होती है।

 

सामान्य मानसून देश के मात्र एक-तिहाई भाग हेतु पर्याप्त होता है। इस प्रकार सिंचाई शेष भागों के लिए अनिवार्य बन जाती है। यहां तक कि पर्याप्त वर्षा वाले क्षेत्रों में भी मानसून का देरी से आना या जल्दी लौट जाना फसलों के लिए घातक सिद्ध होता है। रबी की फसलों के लिए सिंचाई अनिवार्य होती है। वृद्धिकाल के दौरान अधिकांश फसलों के लिए अतिरिक्त जल की जरूरत होती है। इस प्रकार स्थानिक एवं अस्थायी वर्षा के विभेदों पर विजय पाने के लिए सिंचाई अनिवार्य हो जाती है।

 

गैर-सिंचित क्षेत्रों की तुलना में सिंचित क्षेत्रों से उपज में 100: वृद्धि हासिल की जा सकती है।

 

अनिश्चित वर्षा की स्थिति में सिंचाई से उत्पादन की स्थिरता भी प्राप्त होती है। उर्वरक, बीज, कीटनाशक आदि कीमती आगतों के आशानुकूल परिणामों को पर्याप्त आर्द्रता एवं नमी स्तर की उपस्थिति में ही प्राप्त किया जा सकता है।

 

सिंचाई कार्यक्रम से लाभान्वित क्षेत्रों को इस प्रकार वर्गीकृत किया जा सकता है।

 

प्रमुख सिंचाई: खेती योग्य नियंत्रित भूमि (सी.सी..) लगभग 10,000 हेक्टेयर से भी ज्यादा हो।

 

मध्यम सिंचाई: खेती योग्य नियंत्रित भूमि 2,000 हेक्टेयर से अधिक और 10,000 हेक्टेयर से कम हो।

 

निम्न सिंचाई: खेती योग्य नियंत्रित भूमि 2,000 हेक्टेयर से ज्यादा हो।

 

प्रमुख सिंचाई और मध्यम सिंचाई कार्य आमतौर पर धरातलीय जल (नदियों) की सहायता से संभव होता है जबकि निम्न सिंचाई मुख्य रूप से भूमिगत जल से होती है यथा, ट्यूबवेल, बोरिंग आदि।

 

सिंचाई के स्रोत: प्राकृतिक जल या तो नदियों, झीलों, तालाबों एवं नहरों में गुरुत्वबल से गतिशील सतही जल के रूप में उपलब्ध होता है या भूमिगत जल के रूप में, जिसे पशु शक्ति, डीजल या विद्युत के प्रयोग द्वारा ट्यूबवैलों से या कुएं खोदकर निकाला जाता है। किसी क्षेत्र के भौतिक पर्यावरण की दृष्टि से सिंचाई के विभिन्न स्रोत विशिष्ट हो सकते हैं तथा अपनी पृथक् विशेषताएं रख सकते हैं। भारत में सिंचाई के तीन मुख्य स्रोत हैं- कुएं, नहर एवं तालाब।

 

कुएं: सिंचाई का स्रोत कुआं नहर के बाद दूसरे स्थान पर पहुंच गया है। कुओं से भूमिगत जल की पशु शक्ति, रहटों, विद्युत पम्पों या तेल इंजनों के द्वारा ऊपर खींचा जाता है। कुओं द्वारा सिंचाई के लिए ऐसे क्षेत्र उपयुक्त माने जाते हैं, जहां पारगम्य शैल संरचना पायी जाती है, जो अंतः स्रवण के माध्यम से भूमिगत जल की अभिवृद्धि में सहायक होती है। एक जलोढ़ मिट्टी वाली समान्तर स्थलाकृति कुआं खोदने के लिए उपयुक्त होती है तथा ऐसी भूमि की उत्पादकता भी अधिक होती है। शुष्क क्षेत्रों के कुओं का जल क्षारीय या नमकीन हो जाता है, जो पेयजल के रूप में काम आता है और सिंचाई के। नहरों, तालाबों या निम्न भूमियों (जहां वर्षा जल इकट्ठा हो जाता है) के निकट पाये जाने वाले कुओं में लवणीयता की समस्या गंभीर होती है।

 

विगत कुछ दशकों में खुदे कुओं की जगह ट्यूबवैलों तथा पशु शक्ति की जगह विद्युत या डीजल जैसी वाणिज्यिक शक्ति का प्रयोग बढ़ा है। तमिलनाडु में सर्वाधिक विद्युत चालित पम्प सेट हैं। वर्तमान में सौर ऊर्जा चालित वॉटर पम्पों के प्रयोग को प्रोत्साहित किया जा रहा है।

 

तालाब: भारत के प्रायद्वीपीय पठार वाले भाग में सिंचाई का सबसे महत्वपूर्ण साधन तालाब ही है। अपारगम्य शैल संरचना तथा अल्प तरंगित स्थलाकृति वाले क्षेत्रों में, जहां वर्षापात अत्यधिक मौसमी होता है, तालाबों द्वारा सिंचाई महत्वपूर्ण हो जाती है। ऐसी स्थितियां प्रायद्वीपीय क्षेत्र में पायी जाती हैं। कुछ भागों में वर्षा जल को प्राकृतिक गतों या खुदे हुए तालाबों में बंाधों द्वारा एकत्रित कर लिया जाता है। इस भंडारित जल को शुष्क काल के दौरान नालियों के माध्यम से खेतों तक पहुंचाया जाता है। तालाब द्वारा सिंचाई में कई त्रुटियां हैं-इससे तालाब के आस-पास की एक विस्तृत उर्वरक भूमि व्यर्थ पड़ी रहती है। विशाल एवं छिछला जलपिंड अत्यधिक वाष्पोत्सर्जन को जन्म देता है, जिससे जल की हानि होती है। इसके आलावा तालाब को नहरों की तुलना में सिंचाई का विश्वस्त स्रोत नहीं माना जा सकता, क्योंकि ये वर्षा जल के संग्रहण पर निर्भर करते हैं। वर्तमान में तालाबों द्वारा सिंचाई का महत्व कम होता जा रहा है।

 

सिंचाई की नवीनतम प्रौद्योगिकियाँ :

फर्टिगेशन: एक आधुनिक तकनीक है, जिसके अंतर्गत उर्वरक के साथ-साथ सिंचाई की तकनीकी का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें दबाव से बहती जलधारा में उर्वरक घोल प्रविष्ट किया जाता है। फर्टीगेशन में विशिष्ट सिंचाई तकनीक का प्रयोग किया जाता है, इसमें प्रमुख हैं- ड्रिप सिंचाई एवं छिड़काव या स्प्रींकलर सिंचाई पद्धतियां।

 

ड्रिप सिंचाई: इसे टपक सिंचाई भी कहा जाता है। इस प्रणाली में खेत में पाइप लाइन बिछाकर स्थान-स्थान पर नोजल लगाकर सीधे पौधे की जड़ में बूंद-बूंद करके जल पहुंचाया जाता है। सिंचाई की यह विधि रेतीली मृदा, उबड़-खाबड़ खेत तथा बागों के लिए अधिक उपयोगी है।

 

छिड़काव सिंचाई: सिंचाई की इस विधि में पाइप लाइन द्वारा पौधों पर फब्बारों के रूप में पानी का छिड़काव किया जाता है। कपास, मूंगफली, तंबाकू, आदि के लिए यह विधि काफी उपयोगी है। रेगिस्तानी क्षेत्रों के लिए यह विधि उपयुक्त है। इससे 70 तक जल की बचत की जा सकती है।

 

रेन वाटर हारवेस्टिंग: वर्षा के जल (जो अपवाह क्षेत्र में जाकर नष्ट हो जाते हैं) को एकत्रित करके सिंचाई के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इसी प्रकार ऐसे जल को बोरिंग द्वारा भूमि के अंदर जाने दिया जाता है ताकि भूमिगत जल का स्तर ऊपर की ओर बना रहे। वर्तमान में घरों की छतों पर विशाल पात्रों में जल को एकत्रित कर एवं विविध प्रकार के पक्के लघु जलाशय बनाकर भी वर्षा जल की कुछ मात्रा को एकत्रित किया जा रहा है। रेनवाटर हारवेस्टिंग की तकनीक भू-क्षरण और बाढ़-नियंत्रण में भी सहायक होती है।

 

वाटरशेड प्रबंधन: वाटरशेड प्रबंध की नीति पारिस्थितिकी के अनुरूप लघु स्तरीय प्रादेशिक विकास की नीति है, जिसके केंद्र में स्थानीय जल भूमि संसाधन हैं। इस नीति के अंतर्गत लघु स्तर पर जल विभाजक रेखा की मदद से वाटरशेड प्रदेशों का सीमांकन कर लिया जाता है। प्रत्येक वाटरशेड प्रदेश की मृदा और जलीय उपलब्धता, आदि विशेषताओं का आकलन किया जाता है। इस प्रकार वाटरशेड प्रबंध पद्धति के अंतर्गत कृषि विकास, मृदा संरक्षण के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण के भी लक्ष्य को प्राप्त किया जाता है।

 

सौर सुजला योजना के तहत राज्य सरकार छत्तीसगढ़ में किसानों को सौर ऊर्जा संचालित सिंचाई पंप प्रदान करेगा जिससे वे अपनी भूमि पर कृषि सिंचाई कर सकते हैं। छत्तीसगढ़ में ऐसे कई गांव हैं जहाँ राज्य सरकार द्वारा आज भी बिजली नहीं पहुंचाई जा सकी है। इसलिए सौर सुजला योजना उन किसानों के लिए एक वरदान की तरह है जिन्हें सिंचाई के लिए बिजली की जरूरत पड़ती थी।

 

इस को योजना छत्तीसगढ़ सरकार के ऊर्जा विभाग के अधीन क्रेडा (छत्तीसगढ़ राज्य अक्षय ऊर्जा विकास एजेंसी) द्वारा लागू किया जाएगा।  इस योजना के तहत चालू वित्तीय वर्ष यानि 2016-17 के भीतर लगभग 11000 सौर पंप राज्य के कई क्षेत्रों में किसानों को वितरित किया जाएगा। सौर सुजला योजना के तहत लाभार्थियों का चयन राज्य सरकार के कृषि विभाग द्वारा किया जाएगा। किसान जो पहले से ही बोरवेल या पंप योजना  के तहत लाभान्वित है वो भी इस योजना के लिए पात्र होंगे।

 

नलकूप (ट्यूबवेल्ल) शब्द स्वयं यह स्पष्ट करता है कि नल के द्वारा एक कूप का सृजन हुआ है। जब धातुके नल को जमीन में इतना धसा देते हैं कि वह जलस्तर तक पहुँच जाय तो इस प्रकार नलकूप का निर्माण होता है। नलकूपों पर मशीन-चालित पम्प लगाकर उनसे पानी निकाला जाता है और उसे पीने के काम में या सिचाई के काम में लिया जाता है।

 

निष्कर्ष

निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि प्रतिदर्ष ग्राम कातरोके भौतिक, सामाजिक आर्थिक क्षेत्रीय सर्वेक्षण 2018-2019 का मूल्यांकन करने से स्पष्ट होता है कि प्रतिदर्ष ग्राम की भौगोलिक स्थिति का अध्ययन, स्थिति एवं विस्तार, बसाव स्थल एवं पर्यावरणीय अंतर्संम्बन्ध, आकारिकी, जनांकिकीय विषेषताएं एवं कृषि भूमि उपयोग का अध्ययन किया गया है, जिसके अंतर्गत ग्राम कातरो की परिच्छेदिका, ढाल विष्लेषण, सरिता श्रेणीकरण, अपवाह घनत्व विष्लेषण, ग्राम की जनसंख्या संरचना, जनसंख्या घनत्व, जातीय संरचना, साक्षरता, कृषि भूमि उपयोग का अध्ययन किया गया है।

 

इस प्रकार से प्रतिदर्ष ग्राम कातरो के उपरोक्त विष्लेषण से स्पष्ट है कि प्रतिदर्ष ग्राम मे भौगोलिक दषाएँ अनुकूल होने के कारण जनसंख्या सघन बसा हुआ है। आवासीय संरचना मे कच्ची, पक्की एवं विश्रित सभी प्रकार के आवासों का समन्वय है। यहां अनुसूचित जनजाति की संख्या सर्वाधिक है तथा साथ ही साथ अनुसूचिन जाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग भी निवास करते हैं। इसके अलावा प्रतिदर्ष ग्राम में सामान्य वर्ग का अभाव है। भू-उपयोग सर्वेक्षण मे सामान्य भूमि उपयोग, आवासीय भूमि, कृषि भूमि, वन भूमि, परती भूमि एक निश्चित इकाई क्षेत्र मे किया जाता है।

 

प्रतिदर्ष ग्राम कातरो समतल मैदानी भू-भागमे बसा हुआ है, जहां की मुख्य नदी तांदुला है। मिट्टीयों में प्रतिदर्ष ग्राम मे कन्हार मटासी मिट्टी का सर्वाधिक क्षे़त्रफल है। इसके अतिरिक्त भाठा मिट्टी रेतीली मिट्टी का क्षेत्रफल कम है। कृषि भूमियों मे धान गेहूं दलहन फसल का उत्पादन किया जाता है।

  

यहां की जनसंख्या की विषिष्टता मे यह स्पष्ट होता है कि 2011 के जनगणना के अनुसार यहां की जनसंख्या 2065 है एवं वर्तमान मिषन अन्त्योदय बेसलाईन सर्वे 2017 के अनुसार गांव की कुल जनसंख्या 2098 है जनसंख्या घनत्व 2011 मे 293.8 एवं  2017 मे 298.5 व्यक्ति प्रति वर्ग कि.मी. है। यहां की साक्षरता दर 2011 मे 66 है एवं 2017 मे 70.16 है, जिसमे से पुरूषो की साक्षरता 79 तथा महिलाओ की साक्षरता 61.75 है।

 

प््रातिदर्ष ग्रामकातरो के विपणन केन्द्र का प्रभाव क्षेत्र अत्यंत ही संकुचित है। आस-पास के 02-03 कि.मी. की दूरी वाले ग्राम को प्रभावित करता है, 02-03 कि.मी. की दूरी मे मातरोडीह एवं बोरीगार का आते हैं। प्रतिदर्ष ग्राम कातरो में कृषि भूमि उपयोग प्रतिरूप पर्यावरण तथा प्रतिदर्ष ग्राम निवासियो के अनुकूल है।

  

प््रातिदर्ष ग्राम कातरो के सौन्दर्यीकरण हेतु प्रयास किये जाने चाहिए, जिससे यहां का प्रभाव क्षेत्र और अधिक हो। प्रतिदर्ष ग्राम के कृषि भूमि उपयोग के लिए जोत के आकार मे वृद्धि किया जाना चाहिए तथा कृषकों के लिए प्रषिक्षण सुविधा एवं सरकार द्वारा उत्पादित फसलो के प्रात्साहन राषि मे वृद्धि कर कृषकों को प्रात्साहित करे।

 

संर्दभ ग्रंथ सूची

1-   जागिड एन. एवं एस श्रीवास्तव (2019), जयपुर जिले में शस्य वितरण प्रतिरूप समस्यायें एवं संभावनायें, International Journal of Hummanities and Social Sciences Research, vol. 5, issue-2, 37-41

2-    जाट एच. एस. सिंह जी एवं अन्य (2012), प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन करने के लिए संरक्षण खेती अपनाएं, कृषि किरण, वार्षिकांक 5, 6-11

3-    खंडागले, . आहेर एस. एवं अन्य (2019) खेती का महत्व एवं उपयोगिता, राष्ट्रीय हिंदी मासिक पत्रिका कृषि पहल, 20-22

4-    सिंह, एन. (2019-20), बुंदेलखंड के असिंचित कृषि पारिस्थितिकी तंत्र में टिकाउ उत्पादकता हेतु जैविक कृषि प्रणाली , कृषि किरण वार्षिकांक 12 शाकरी अनु केन्द्रीय मृदा लवणता  अनुसंधान संस्था, करनाल (हरियाणा), 20-23

5-    सिंह, आर (2019) खेती अपनायें जीवन स्वस्थ बनायंे, महायोगी गोरखनाथ कृषि विज्ञान केन्द्र, गोरखपुर (उत्तर प्रदेष), संस्करण 1, अंक 1, 11-13

6-    शर्मा, के.. (2012) जैविक खेती नई दिषाएं (सजीव-सरल सतत्,) एग्रोबॉयोस (इंडिया) नसरानीसिनेमा के पीछे, चौपासनी रोड, जोधपुर

 

 

Received on 17.04.2023        Modified on 12.05.2023

Accepted on 10.06.2023        © A&V Publication all right reserved

Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2023; 11(2):72-88.

DOI: 10.52711/2454-2687.2023.00012